sakib mazeed writes on mirza ghalib

दुनिया छोड़ने के 157 साल बाद भी कैसे ‘ज़िंदा’ हैं मिर्ज़ा ग़ालिब?

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

  • मिर्ज़ा ग़ालिब

दुनिया-जहान में जब भी उर्दू की बात होगी, ग़ालिब याद किए जाएंगे. जब तक उर्दू ज़बान के नाम पर क़लम चलते रहेंगे, जब तक उर्दू लिखने के लिए कोरे काग़ज़ हाथों में उठाए जाएंगे और कुतुबख़ाने (लाइब्रेरी) में जिल्द पलटी जाती रहेगी, ग़ालिब याद किए जाएंगे. जब-जब उर्दू शायरी में नए प्रयोग की बात होगी, ग़ालिब को पढ़ा जाएगा. जब-जब हिंदुस्तान के इतिहास पर बात होगी, ग़ालिब को ज़रूर लिखा जाएगा. जब भी आगरा और दिल्ली के क़िस्से सुनाए जाएंगे, शायद ग़ालिब के बिना क़िस्सागोई अधूरी रहेगी.

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