Akbar Allahabadi by sakib mazeed

Akbar Allahabadi: 100 साल पहले ही ‘स्टॉकहोम सिंड्रम’ को पहचानने वाले शायर

आज जिसे ‘स्टॉकहोम सिन्ड्रम’ कहा जाता है, उर्दू शायर अकबर इलाहाबादी ने उसे क़रीब 100 साल पहले ही पहचान लिया था, जब अंग्रेज़ी हुकूमत अपने शबाब पर थी. ‘स्टॉकहोम सिन्ड्रम’ यानी मजबूरी की वो सिचुएशन, जहां किसी क़ैदी को अपने क़ैद कर लेने वाले से ही लगाव पैदा हो जाता है. यहाँ तक कि क़ैद हुआ शख़्स क़ैद करने वाले को और ख़ुद को एक ही समझ कर उसके साथ अपने को जोड़ लेता है.

अकबर इलाहाबादी साहब कहा करते थे कि ये हालत आज इस तरह मौजूद है कि पश्चिम के लोग एशिया का शोषण कर रहे हैं और एशिया के लोग उन्हीं पर क़ुर्बान हुए जा रहे हैं. तब उन्होंने ये शेर कहा था-

मिटाते हैं वो हमको तो अपना काम करते हैं
मुझे हैरत तो उन पर है जो इस मिटने पे मरते हैं

  • अकबर इलाहाबादी (Akbar Allahabadi)

कौन थे अकबर इलाहाबादी?

अकबर इलाहाबादी हिंदुस्तानी तहज़ीब के ऐसे शायर थे, जिनकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ इंक़लाब, मोहब्बत और हिंदू-मुस्लिम एकता का अद्भुत संगम झलकता है.

उन्होंने अपने दौर की जनता की आवाज़ को नज़्मों और ग़ज़लों में ढालकर हमेशा ज़िंदा रखा. रोज़मर्रा की साधारण चीज़ों को भी अकबर साहब ने बेहद चुटीले और अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया.

16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद ज़िले के बारा क़स्बे में जन्मे सय्यद अकबर हुसैन रिज़वी, जिन्हें हम अकबर इलाहाबादी के नाम से जानते हैं, ने अपने ज़िंदगी की शुरुआत रेलवे इंजीनियरिंग विभाग में क्लर्क के पद से की. आगे चलकर उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया. वकालत का अनुभव करने के बाद उन्होंने एक मशहूर शेर कहा, जिसे सुनकर शैतान भी हैरान रह गया होगा-

पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा,
लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए.

  • अकबर इलाहाबादी

हास्य और व्यंग्य के बेताज बादशाह अकबर इलाहाबादी ने अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में भी क्रांतिकारी शायरी लिखी. उनकी कलम हमेशा सच्चाई के साथ खड़ी रही और कभी भी डर या ख़ौफ़ के आगे झुकी नहीं. यही वजह है कि उनके शेर आज भी उतने ही प्रासंगिक महसूस होते हैं, जितने उस वक़्त थे-

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ,
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ.

  • अकबर इलाहाबादी

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