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‘जिन चरागों से तअस्सुब का धुआं…’, राहत इंदौरी की क़िस्मत ऐसे बदली

Rahat Indori Ke Qissey: राहत इंदौरी ने पेंटिंग में कमाल करने के बाद अदबी महफ़िलों का रुख किया था. उनके क़लम से एक ग़ज़ल निकली और इसी के साथ उनकी क़िस्मत का फ़ैसला लिखा जा चुका था. इसके बाद राहत साहब का क़लम कभी रुका नहीं.

हुआ यूं कि राहत साहब को एक मुशायरे के लिए महाराष्ट्र के भुसावल से दावत आई. शायरी की दुनिया में राहत साहब का ये शुरुआती दौर था और वे तरन्नुम में ग़ज़लें पढ़ा करते थे. लेकिन उस मुशायरे के बाद ऐसा कुछ हुआ कि राहत साहब तरन्नुम छोड़कर तहत में पढ़ने लगे.

महाराष्ट्र ने ऐसे बदली क़िस्मत…

भुसावल के मुशायरे के लिए जब राहत साहब घर से निकले तो उन्होंने रास्ते में एक ग़ज़ल कही और महाराष्ट्र पहुंचकर उर्दू के जाने-माने शायर कृष्णबिहारी नूर से उनकी मुलाक़ात हुई. ग़ज़ल पर ख़ूब तारीफ़ मिली. उस्ताद कहते हैं कि आज इस ग़ज़ल को मुशायरे में सुनाओ. राहत साहब का जवाब आता है कि ग़ज़ल नई है और अभी तरन्नुम नहीं सेट हो पाई है. इस पर नूर साहब कहते हैं कि ‘राहत मियां इसे किसी तरन्नुम की ज़रूरत नहीं है, तहत में ही सुनाओ.’

अब राहत साहब सोच में पड़ गए…क्योंकि वो नूर साहब की नाफ़रमानी भी नहीं करना चाहते थे. राहत साहब ने फ़ैसला कर लिया कि अगर सुनाते वक़्त मामला नहीं बना, तो झट से कोई तरन्नुम वाली ग़ज़ल गुनगुना दूंगा. राहत साहब मंच पर आते हैं और ऐसी परफ़ॉर्मेंस देते हैं कि आडियंस झूम उठती है. बड़े शायरों से भी ख़ूब तारीफ़ें मिलती हैं. नई ग़ज़ल उस रात इतनी चलती है कि पूरा मुशायरा एक तरफ़ और राहत साहब का कलाम एक तरफ़.

इसी मुशायरे के बाद राहत साहब ने तरन्नुम में पढ़ना कम करके तहत में ग़ज़लें पढ़ने लगे और आगे चलकर राहत साहब का यही अंदाज़ उनकी पहचान बन गया.

जिन चरागों से तअस्सुब का धुआं उठता है
उन चरागों को बुझा दो तो उजाले होंगे
मैं अगर वक़्त का सुकरात हो भी जाऊँ तो क्या
मेरे हिस्से में वही ज़हर के प्याले होंगे

  • राहत इंदौरी

جن چراغوں سے تعصب کا دھواں اُٹھتا ہے
اُن چراغوں کو بُجھا دو تو اُجالے ہوں گے

میں اگر وقت کا سقراط ہو بھی جاؤں تو کیا
میرے حصّے میں وہی زہر کے پیالے ہوں گے

  • راحت اندوری

Jin charagon se ta’assub ka dhuaan uthta hai
Un charagon ko bujha do to ujale honge

Main agar waqt ka Suqraat ho bhi jaaun to kya
Mere hisse mein wahi zehar ke pyaale honge

  • Rahat Indori

अदबी दुनिया में दिलचस्पी रखने वालों ने राहत इंदौरी को हमेशा अपनी पलकों पर बिठाकर सुना. ये कोई दुनिया का करिश्मा नहीं था, बल्कि उनके क़लम की ताक़त, लहज़े की मिठास, ज़िंदादिली, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता का जादू था. यही उनकी असलियत थी कि जब वो हज़ारों सामईन यानी श्रोता की मौजूदगी में मंच पर खड़े होकर हाथ हवा में लहराते और एक आंख दबाकर शेर पढ़ते, तो उनकी आवाज़ का असर ऐसा होता कि मुशायरे में बैठे बूढ़े हों या जवान, सब पर पागलपन सा छा जाता था.

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