Sharm, vahshat, jhijhak, pareshani
Naaz se kaam kyun nahin leti
Aap, voh, ji, magar yeh sab kya hai
Tum mera naam kyun nahin leti…
Maine har baar tujhse milte waqt
Tujhse milne ki aarzu ki hai
Tere jaane ke baad bhi maine
Teri khushboo se guftagu ki hai.
شرم، وحشت، جھجک، پریشانی
ناز سے کام کیوں نہیں لیتی
آپ، وہ، جی، مگر یہ سب کیا ہے
تم میرا نام کیوں نہیں لیتی…
میں نے ہر بار تجھ سے ملتے وقت
تجھ سے ملنے کی آرزو کی ہے
تیرے جانے کے بعد بھی میں نے
تیری خوشبو سے گفتگو کی ہے۔
शर्म, वहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती
आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती…
मैंने हर बार तुझसे मिलते वक़्त
तुझसे मिलने की आरज़ू की है
तेरे जाने के बाद भी मैंने
तेरी ख़ुशबू से गुफ़्तगू की है.
– Jaun Elia
जेन-ज़ी के बेहद पसंदीदा शायर, जौन एलिया साहब का मिज़ाज बचपन से ही आशिक़ाना था. उनकी एक ख़याली महबूबा हुआ करती थीं, जिससे वो अक्सर बातें किया करते थे. जौन साहब बारह बरस की उम्र में अपनी ख़याली महबूबा सोफ़िया को चिट्ठियाँ भी लिखा करते थे. फिर नौजवानी में उन्होंने एक ख़ूबसूरत चेहरे से मोहब्बत भी की, जिसे वो ज़िंदगी भर याद करते रहे, लेकिन उससे कभी इज़हार-ए-इश्क़ नहीं किया. इसके पीछे की वजह भी बेहद दिलचस्प है. वे कहते थे कि प्यार का इज़हार बेहद छोटा काम होता है.
जौन साहब एक वाक़ये का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, “एक लड़की हमारे घर आई, उस वक़्त मैं खाना खा रहा था. मैंने उसे देखते ही फ़ौरन निवाला निगल लिया, क्योंकि महबूबा के सामने निवाला चबाने का काम मुझे बदतमीज़ी और बेहूदगी जैसा महसूस हुआ. मैं अक्सर ये सोचकर शर्मिंदा हो जाता था कि मुझे देखकर कर वो कभी-कभी सोचती होगी कि मेरे जिस्म में भी आँतों जैसी घिनौनी और ग़ैर-रूमानी चीज़ पाई जाती हैं.”
तो ऐसे मिज़ाज के थे जौन साहब… अगर आप भी जॉन एलिया के बारे में ऐसा कुछ जानते हैं, तो कॉमेंट बॉक्स आप ही के लिए खुला है.

Sakib Mazeed is an Indian Journalist With a solid academic grounding in journalism and experience at some of India’s leading digital platforms, he has established himself as a storyteller who moves with ease between the field and the newsroom.

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