राहत इंदौरी साहब ने जब मुशायरों की दुनिया में क़दम रखा, तो एक नई बयार बह गई. वो इसलिए क्योंकि राहत साहब अपने कलाम में आसान ज़बान के साथ सीधा-सपाट कथन पेश करते गए और वो सीधे सामईन के दिलों में उतरता गया. राहत इंदौरी के इस अंदाज़ ने उनकी कामयाबी में बड़ा रोल अदा किया. उन्होंने अपने विचारों, अपने वक्तव्यों, राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों से माइक पर फ़तह हासिल की.
शायर और लेखक दीपक रूहानी साहब कहते हैं कि जिस तरह 1947 में हिंदुस्तान के आज़ाद होने के बाद लोकतंत्र स्थापित हुआ, उसी तरह राहत साहब ने मुशायरे को आज़ादी दिलाई और उसे जम्हूरियत यानी लोकतंत्र के इज़हार-ए-ख़याल का एक माध्यम बनाया. राहत साहब ने रिवायत तोड़कर हमेशा नया लिखने की कोशिश की.
इस ख़याल के आस-पास राहत साहब ने एक शेर भी कहा-
फिर वही ‘मीर’ से अब तक की सदाओं का तिलिस्म
हैफ़ ‘राहत’ कि तुझे कुछ तो नया लिखना था
- राहत इंदौरी

Sakib Mazeed is an Indian Journalist With a solid academic grounding in journalism and experience at some of India’s leading digital platforms, he has established himself as a storyteller who moves with ease between the field and the newsroom.

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